किसानों की जमीन पर बढ़ता विवाद,
जमीन दलाल बसंत अग्रवाल का नया कारनामा सामने आया है, छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से सटे इलाकों में इन दिनों जमीन से जुड़ा एक गंभीर विवाद चर्चा में है। गिरौद और उरकुरा जैसे क्षेत्रों के किसान आरोप लगा रहे हैं कि उनकी पुश्तैनी जमीनों तक पहुंच के रास्ते बंद कर दिए गए हैं, जिससे खेती करना लगभग नामुमकिन हो गया है। इस पूरे मामले में बसंत अग्रवाल पर आरोप लगे हैं, जिन्हें किसान और स्थानीय संगठन ‘भू-माफिया’ और ‘राजस्व आतंकवाद’ जैसे शब्दों से संबोधित कर रहे हैं। Raipurbuzz के अनुसार, यह मामला सिर्फ जमीन खरीद-बिक्री का नहीं, बल्कि किसानों की आजीविका और प्रशासनिक व्यवस्था पर उठते सवालों से भी जुड़ा है।
रास्ते बंद, खेती ठप: किसानों का बसंत अग्रवाल पर सबसे बड़ा आरोप
पीड़ित किसानों का कहना है कि उनके खेतों तक जाने वाले पुराने और परंपरागत रास्तों पर बसंत अग्रवाल ने अचानक ऊंची बाउंड्री वॉल खड़ी कर दी गई। इन दीवारों की वजह से ट्रैक्टर, हार्वेस्टर या अन्य कृषि मशीनें खेत तक नहीं पहुंच पा रहीं। कई किसानों ने बताया कि दशकों से जिन रास्तों का इस्तेमाल वे और उनके पूर्वज करते आए थे, वही रास्ते अब पूरी तरह बंद हैं। खेती रुकने से न केवल फसल प्रभावित हुई है, बल्कि किसानों की रोजमर्रा की आय पर भी सीधा असर पड़ा है।
जलभराव और फसल बर्बादी का आरोप
किसानों के आरोप यहीं खत्म नहीं होते। उनका कहना है कि खेतों से पानी निकलने की प्राकृतिक निकासी को भी बंद कर दिया गया है। कहीं ऊंची सड़क बना दी गई तो कहीं नालियों को पाट दिया गया, जिसके चलते बारिश या सिंचाई के बाद पानी खेतों में भर जाता है। कई जगहों पर धान और सब्जियों की फसल पूरी तरह सड़ चुकी है। किसानों का दावा है कि यह सब जानबूझकर किया गया, ताकि वे मजबूर होकर अपनी जमीन बेचने को तैयार हो जाएं।
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ओने-पौने दाम पर जमीन खरीदने का दबाव
स्थानीय किसानों का कहना है कि जब खेती करना मुश्किल हो जाता है और आर्थिक दबाव बढ़ता है, तब उन्हें बसंत अग्रवाल द्वारा जमीन बेचने के प्रस्ताव दिए जाते हैं। आरोप है कि बाजार भाव जहां करीब 1.5 करोड़ रुपये प्रति एकड़ बताया जाता है, वहीं किसानों को 60 से 70 लाख रुपये में सौदा करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। किसानों के मुताबिक, दलाल यह साफ कहते हैं कि खेती अब संभव नहीं है, इसलिए जमीन बेच देना ही ‘बेहतर विकल्प’ है।
धार्मिक आयोजनों से सामाजिक छवि मजबूत करने का दावा
वीडियो और स्थानीय दावों के अनुसार, बसंत अग्रवाल पर यह भी आरोप है कि वे अपनी सामाजिक और राजनीतिक पकड़ मजबूत करने के लिए बड़े धार्मिक आयोजनों का सहारा लेते हैं। पंडित धीरेंद्र शास्त्री और पंडित प्रदीप मिश्रा जैसे चर्चित कथावाचकों के कार्यक्रम आयोजित कराए जाने की बात कही जा रही है। किसानों का कहना है कि ऐसे आयोजनों के जरिए बड़े नेताओं और मंत्रियों के साथ मंच साझा कर प्रभाव बनाया जाता है, जिससे उनके खिलाफ आवाज उठाना और मुश्किल हो जाता है।
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प्रशासनिक भूमिका पर सवाल
इस पूरे विवाद में प्रशासनिक मिलीभगत के आरोप भी सामने आए हैं। किसानों का कहना है कि तहसीलदार, पटवारी और पुलिस स्तर पर उन्हें अपेक्षित सहयोग नहीं मिल रहा। एक मामले में तहसीलदार के आदेश पर दीवार तोड़कर रास्ता खुलवाया गया, लेकिन आरोप है कि अगले ही दिन फिर से वही दीवार खड़ी कर दी गई। किसान परमा साहू ने Raipurbuzz को बताया कि सिंचाई विभाग से पुलिया बनाने की अनुमति मिलने के बावजूद काम रुकवा दिया गया। उनका आरोप है कि दबाव और प्रभाव के चलते प्रशासन कार्रवाई करने से बच रहा है।










